- क्या आपका दिमाग सच में आराम कर पा रहा है? स्क्रीन की दुनिया में ‘मेंटल बर्नआउट’ का खतरा
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान शायद ही कभी सच में शांत बैठ पाता है। पहले एक दौर था जब लंबा सफर खिड़की के बाहर देखते हुए कट जाता था, लाइन में इंतजार करते समय लोग आसपास की चीजों को महसूस करते थे और रात को सोने से पहले दिमाग खुद-ब-खुद धीमा पड़ जाता था। लेकिन अब वक्त बदल चुका है। आज हमारा हर खाली पल किसी न किसी स्क्रीन से भर गया है। कभी मोबाइल का नोटिफिकेशन, कभी रील्स और छोटी वीडियो, कभी पॉडकास्ट, तो कभी लगातार आने वाले मैसेज। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या इस डिजिटल दौर में हमारे दिमाग को असली आराम मिल भी पा रहा है?
लगातार बैकग्राउंड स्टिमुलेशन से बदल रहा है ब्रेन पैटर्न
न्यूरोलॉजिस्ट्स का कहना है कि लगातार मिलने वाला यह बैकग्राउंड स्टिमुलेशन इंसान के दिमाग के काम करने के तरीके को बदल रहा है। बाहर से देखने पर भले ही कोई इंसान सोफे या बेड पर आराम करता दिखाई दे, लेकिन उसका दिमाग लगातार एक्टिव रहता है। यही वजह है कि आजकल लोग बिना ज्यादा शारीरिक मेहनत किए भी हर समय मानसिक रूप से थका हुआ महसूस करते हैं।
क्या हमारा ब्रेन हमेशा एक्टिव रहने के लिए बना है
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार इंसानी दिमाग को कभी भी इस तरह लगातार एक्टिव रहने के लिए नहीं बनाया गया था। पहले के समय में दिनभर में छोटे-छोटे ऐसे कई पल मिल जाते थे, जब दिमाग खुद-ब-खुद शांत हो जाता था। लेकिन अब हर खाली जगह डिजिटल चीजों से भर चुकी है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, लगातार आने वाले नोटिफिकेशन और हर समय दुनिया से जुड़े रहने का दबाव इंसानी दिमाग को एक सेकंड के लिए भी सुस्ताने का मौका नहीं देता।
डिजिटल थकान और नर्वस सिस्टम पर इसका असर
एक्सपर्ट बताते हैं कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह मानसिक थकान तुरंत महसूस नहीं होती। लोगों को अक्सर लगता है कि बेड पर लेटकर मोबाइल स्क्रॉल करना या देर रात तक वीडियो देखना मनोरंजन और आराम देने वाला काम है, लेकिन असल में उस वक्त भी दिमाग लगातार नई जानकारी को प्रोसेस कर रहा होता है। यही कारण है कि हमारा नर्वस सिस्टम हमेशा एक हल्की सतर्क अवस्था (alert mode) में बना रहता है। धीरे-धीरे यह आदत मानसिक थकान, ध्यान की कमी और इमोशनल बर्नआउट में बदल जाती है। नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ की रिसर्च में भी यह साफ सामने आया है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन देखने और देर रात तक डिजिटल चीजों में लगे रहने से नींद की क्वालिटी, इमोशनल संतुलन और फोकस करने की क्षमता पर बेहद बुरा असर पड़ता है।
ग्लिम्फैटिक सिस्टम और गहरी नींद का कनेक्शन
मेडिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक दिमाग के अंदर एक खास सफाई तंत्र होता है, जिसे ‘ग्लिम्फैटिक सिस्टम’ कहा जाता है। यह सिस्टम गहरी नींद के दौरान सबसे ज्यादा सक्रिय होता है और दिनभर दिमाग में जमा होने वाले जहरीले मेटाबॉलिक पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है। अगर लगातार नींद की कमी रहे या रात में ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल की जाए, तो लंबे समय में दिमाग की काम करने की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। बेहतर दिमागी सेहत के लिए कम से कम 6 से 8 घंटे की बिना रुकावट नींद लेना और रात में सोने से पहले स्क्रीन टाइम को पूरी तरह घटाना बेहद जरूरी है।
