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  • हजारों साल पहले बताया गया जीवन का वह सूत्र, जो आज की भागदौड़ और तनाव भरी जिंदगी में भी रास्ता दिखाता है

NBM ज्ञान श्रृंखला | भारत का अनमोल ज्ञान भाग-4

आज का इंसान पहले से ज्यादा सुविधाओं के बीच जी रहा है। तकनीक ने दुनिया को हाथों में ला दिया है। सफलता के अवसर बढ़े हैं, पहचान बनाने के रास्ते बढ़े हैं, लेकिन इसके साथ ही बेचैनी, तनाव, तुलना और असंतोष भी तेजी से बढ़ा है।

हर कोई कुछ और पाने की कोशिश में लगा है। कोई बड़ी सफलता चाहता है, कोई ज्यादा पहचान चाहता है, कोई दूसरों से आगे निकलने की दौड़ में है। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल कहीं पीछे छूट जाता है कि आखिर इतना सब पाने के बाद भी मन पूरी तरह शांत क्यों नहीं होता?

यही सवाल हजारों साल पहले अष्टावक्र गीता में भी उठता है। राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के संवाद में जीवन की इसी गहरी सच्चाई को समझाया गया है।

ऋषि अष्टावक्र राजा जनक से कहते हैं कि यदि जीवन में वास्तविक शांति और मुक्ति चाहिए तो विषयों को विष के समान समझना होगा और क्षमा, सरलता, दया, संतोष और सत्य को अमृत के समान अपनाना होगा।

यहां विषयों का अर्थ संसार की जिम्मेदारियों से भागना नहीं है। इसका अर्थ उन इच्छाओं और आदतों से है, जो धीरे-धीरे इंसान के मन पर अधिकार कर लेती हैं। जब सुख की इच्छा जरूरत से आगे बढ़कर लालसा बन जाती है, जब सफलता की चाह तुलना में बदल जाती है और जब सम्मान की इच्छा अहंकार का रूप ले लेती है, तब वही चीजें मनुष्य की शांति छीनने लगती हैं।

अष्टावक्र इसी अवस्था को विष के समान बताते हैं, क्योंकि बाहर से आकर्षक दिखने वाली ये चीजें अंदर से मन को अशांत कर सकती हैं।

क्रोध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब इंसान क्रोध करता है तो उसे लगता है कि वह किसी दूसरे को जवाब दे रहा है, लेकिन वास्तव में सबसे पहले उसका अपना मन अशांत होता है। क्रोध रिश्तों में दूरी पैदा करता है और व्यक्ति के विवेक को कमजोर करता है। इसलिए अष्टावक्र क्षमा को अमृत कहते हैं।

क्षमा का अर्थ यह नहीं कि गलत को सही मान लिया जाए। क्षमा का अर्थ है अपने मन को उस बोझ से मुक्त कर देना, जो लगातार भीतर की शांति को खत्म करता रहता है।

इसी तरह कुटिलता और छल भले ही कुछ समय के लिए लाभ देते हुए दिखाई दें, लेकिन मनुष्य को भीतर से कमजोर कर देते हैं। सरलता यानी आर्जव व्यक्ति के चरित्र को मजबूत बनाता है। जो व्यक्ति बाहर और भीतर से एक जैसा होता है, उसे अपने जीवन में किसी दिखावे की जरूरत नहीं पड़ती।

आज के समय में दया और करुणा की आवश्यकता भी पहले से अधिक बढ़ गई है। प्रतिस्पर्धा की दौड़ में कई बार इंसान दूसरों की भावनाओं को समझना भूल जाता है। जबकि भारतीय ज्ञान परंपरा हमेशा से यह सिखाती रही है कि दूसरों के दुख को समझना कमजोरी नहीं, बल्कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है।

अष्टावक्र संतोष को जीवन का बहुत बड़ा अमृत बताते हैं। आज असंतोष आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बन चुका है। इंसान के पास जो है, उससे ज्यादा ध्यान उस पर रहता है जो उसके पास नहीं है।

दूसरों की सफलता देखकर अपनी जिंदगी अधूरी लगने लगती है। तुलना धीरे-धीरे खुशी को खत्म कर देती है। लेकिन संतोष का अर्थ यह नहीं कि इंसान सपने देखना या मेहनत करना छोड़ दे।

संतोष का वास्तविक अर्थ है — जो मिला है उसके प्रति आभार रखते हुए आगे बढ़ना। जब इंसान वर्तमान को स्वीकार करके प्रयास करता है तो उसका जीवन तनाव नहीं, बल्कि संतुलन के साथ आगे बढ़ता है।

अष्टावक्र का एक गहरा संदेश सम्मान और सफलता को लेकर भी है। अक्सर इंसान पूरी जिंदगी दूसरों से सम्मान पाने की कोशिश करता रहता है। लेकिन जो व्यक्ति अपनी कीमत स्वयं नहीं समझता, वह हमेशा दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर रहता है।

सच्चा सम्मान बाहर से मिलने वाली प्रशंसा में नहीं, बल्कि स्वयं की चेतना और आत्मविश्वास में छिपा होता है।

इसी प्रकार सत्य को अष्टावक्र जीवन का आधार बताते हैं। असत्य कुछ समय के लिए आसान रास्ता दिखा सकता है, लेकिन धीरे-धीरे व्यक्ति को अपने ही वास्तविक स्वरूप से दूर कर देता है। सत्य के साथ चलने वाला व्यक्ति कठिनाइयों का सामना कर सकता है, लेकिन भीतर से कमजोर नहीं होता।

अष्टावक्र गीता का यह ज्ञान हजारों साल पुराना होते हुए भी आज के दौर में बेहद प्रासंगिक है। यह हमें बताता है कि असली परिवर्तन बाहर की दुनिया को जीतने में नहीं, बल्कि अपने भीतर के क्रोध, लालसा, अहंकार और असंतोष को समझने में है।

क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी सफलता केवल यह नहीं कि हमने कितना पाया, बल्कि यह है कि उसे पाने की यात्रा में हमने अपनी शांति और स्वयं को खोया तो नहीं।

क्रमशः…

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