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शुभम कुमार। नवभारत मीडिया

उत्तराखंड की पावन देवभूमि अपने आंचल में न जाने कितने अलौकिक और अकल्पनीय रहस्य छुपाए हुए है। कल के अंक में हमने जहां रूपकुंड झील के अनसुलझे कंकालों के रहस्य को जाना था, वहीं आज हम आपको लेकर चलते हैं कुमाऊं मंडल के पिथौरागढ़ जिले में स्थित एक ऐसी विस्मयकारी जगह पर, जिसे ‘पाताल भुवनेश्वर गुफा’ कहा जाता है। गंगोलीहाट कस्बे के पास जमीन से करीब 90 फीट नीचे स्थित यह गुफा कोई साधारण प्राकृतिक संरचना नहीं है, बल्कि इसे सनातन संस्कृति में दुनिया के सबसे रहस्यमयी भूगर्भिक स्थलों में से एक माना जाता है। स्कंद पुराण के मानसखंड में इस गुफा का विस्तार से वर्णन मिलता है, जिसके अनुसार इस रहस्यमयी गुफा में एक साथ केदारनाथ, बद्रीनाथ और अमरनाथ के दर्शन हो जाते हैं और यहाँ भगवान शिव के साथ-साथ 33 करोड़ देवी-देवताओं का अदृश्य वास है।

गुफा के भीतर स्थापित हैं चार युगों के स्तंभ और कलयुग का रहस्य

एक संकरे और बेहद ढलान वाले रास्ते से होते हुए जब कोई इस गुफा के अंधेरे और ठंडे गर्भ में प्रवेश करता है, तो सामने एक पूरी नई और चमत्कारी दुनिया नजर आती है। यहाँ सदियों से पानी की बूंदों और चूने के पत्थरों के प्राकृतिक मिलन से ऐसी अद्भुत आकृतियां उकेरी गई हैं जिन्हें देखकर विज्ञान भी हैरान रह जाता है। गुफा के भीतर चार मुख्य प्राकृतिक स्तंभ मौजूद हैं, जिन्हें हमारे पौराणिक ग्रंथों के अनुसार चार युगों का प्रतीक माना जाता है—सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग।

इनमें से सबसे ज्यादा दिलचस्प, रहस्यमयी और डराने वाला स्तंभ ‘कलयुग का स्तंभ’ है। इस स्तंभ के ठीक ऊपर छत से लटकता हुआ एक पत्थर का पिंड दिखाई देता है। स्थानीय पुरोहितों और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह कलयुग का स्तंभ हर साल चावल के दाने के बराबर ऊपर की ओर बढ़ रहा है। शास्त्रों में वर्णित लोककथाओं के अनुसार, जिस दिन कलयुग का यह बढ़ता हुआ स्तंभ ऊपर लटके हुए पत्थर के पिंड से पूरी तरह टकरा जाएगा, उसी दिन इस धरती पर पाप की सीमा समाप्त हो जाएगी, कलयुग का अंत हो जाएगा और पूरी दुनिया महाप्रलय की गोद में समा जाएगी।

शेषनाग की विशाल पीठ, ऐरावत हाथी और अमृत की बूंदें

इस गुफा की भौगोलिक बनावट इतनी अलौकिक है कि इसमें नीचे उतरते ही ऐसा महसूस होता है जैसे आप किसी विशालकाय शेषनाग की पीठ पर पैर रखकर चल रहे हों। यहाँ पत्थरों की लहरदार बनावट हूबहू शेषनाग के शरीर और फन जैसी दिखाई देती है, मानो शेषनाग ने पूरी पृथ्वी के भार के साथ इस गुफा को भी थाम रखा हो। थोड़ा और आगे बढ़ने पर पत्थरों की एक ऐसी विशाल आकृति दिखाई देती है जैसे साक्षात इंद्र का वाहन ऐरावत हाथी खड़ा हो।

इसके ठीक ऊपर एक अमरनाथ की तरह प्राकृतिक रूप से बनी शिव जी की जटाएं हैं, जिनसे लगातार पानी की बूंदें टपकती रहती हैं। गुफा के एक और छोर पर कालभैरव की जीभ की आकृति बनी हुई है, जिसके बारे में कहा जाता है कि जो भी मनुष्य इसके भीतर से सकुशल गर्भगृह तक पहुंच जाता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके अलावा, यहाँ भगवान गणेश का वह कटा हुआ मस्तक भी पत्थर के रूप में मौजूद है, जिसके ऊपर एक कमल के फूल की आकृति से लगातार पानी की बूंदें अमृत रस की तरह गिरती हैं।

त्रेतायुग से कलयुग तक की ऐतिहासिक खोज यात्रा

इस गुफा का इतिहास और इसकी खोज की कहानी भी किसी लोककथा जैसी रोमांचक है। माना जाता है कि इस गुफा की खोज सबसे पहले सूर्यवंश के प्रतापी राजा ऋतुपर्णा ने त्रेतायुग में की थी, जब वे एक हिरण का पीछा करते हुए भटक गए थे और उन्हें यहाँ नागराज तक्षक के दर्शन हुए थे। इसके बाद द्वापरयुग में जब पांडव अपना सब कुछ हारकर अज्ञातवास काट रहे थे, तब उन्होंने इस गुफा को अपना आश्रय बनाया था और यहाँ बैठकर भगवान शिव की घोर तपस्या की थी।

पांडवों के जाने के बाद सदियों तक यह गुफा फिर से इतिहास के पन्नों में खो गई। इसके बाद कलयुग में, यानी आठवीं शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य जब भारत भ्रमण पर निकले और उन्होंने उत्तराखंड के चार धामों का जीर्णोद्धार किया, तब उन्हें इस पवित्र गुफा का साक्षात्कार हुआ। उन्होंने ही यहाँ पर पहली बार विधिवत पूजा-अर्चना शुरू करवाई और दुनिया को इस पाताल लोक के अस्तित्व से रूबरू कराया। आज भी यहाँ आने वाले देश-विदेश के भू-वैज्ञानिक (Geologists) हैरान हैं कि जमीन के इतने नीचे ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा कैसे बनी रहती है और पानी की बूंदें कैसे सदियों से बिना थमे सटीक आकृतियों का निर्माण कर रही हैं। यह आस्था और विज्ञान का एक ऐसा अनूठा संगम है, जिसे जीवन में एक बार देखना हर किसी के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव बन जाता है।

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