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  • कटारमल सूर्य मंदिर: 800 साल पुरानी वो धरोहर, जिसकी वास्तुकला आज भी करती है हैरान

 

शुभम कुमार

 

देवभूमि उत्तराखण्ड की पहचान केवल हिमालय, चारधाम और प्राकृतिक सुंदरता तक सीमित नहीं है। यहां की पहाड़ियों में ऐसी कई ऐतिहासिक धरोहरें छिपी हैं, जो प्राचीन भारत के विज्ञान, कला और आध्यात्मिक ज्ञान की अद्भुत कहानी सुनाती हैं। ऐसी ही एक अनमोल विरासत है अल्मोड़ा जिले में स्थित कटारमल सूर्य मंदिर। यह मंदिर न सिर्फ उत्तराखण्ड बल्कि पूरे उत्तर भारत के प्रमुख सूर्य मंदिरों में गिना जाता है। भगवान सूर्य को समर्पित यह प्राचीन मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला, दुर्लभ प्रतिमा और ऐतिहासिक महत्व के कारण विशेष स्थान रखता है।

 

बड़ादित्य के नाम से पूजे जाते हैं भगवान सूर्य

 

कटारमल सूर्य मंदिर में स्थापित सूर्य देव को स्थानीय रूप से बड़ादित्य के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि मंदिर के विशाल स्वरूप और विशेष महत्व के कारण इसे यह नाम मिला। यहां भगवान सूर्य की एक दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है, जिसमें सूर्य देव आसन मुद्रा में विराजमान दिखाई देते हैं। ऐसी प्रतिमाएं बहुत कम देखने को मिलती हैं और यही इस मंदिर को और खास बनाती है।

 

9वीं शताब्दी में हुआ था मंदिर का निर्माण

 

इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण लगभग 9वीं शताब्दी में कत्यूरी राजवंश के शासक राजा कटारमल्ल द्वारा कराया गया था। माना जाता है कि राजा के नाम पर ही इस स्थान को कटारमल कहा जाने लगा। पत्थरों से बना यह मंदिर उस समय की विकसित वास्तुकला और निर्माण कौशल का अद्भुत उदाहरण है। बिना आधुनिक तकनीक के पहाड़ों के बीच इतनी भव्य संरचना तैयार करना आज भी लोगों को आश्चर्यचकित करता है।

 

कोणार्क सूर्य मंदिर से मिलती है स्थापत्य की झलक

 

कटारमल सूर्य मंदिर की वास्तुकला की तुलना कई बार ओडिशा के प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर से भी की जाती है। दोनों मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित हैं और सूर्य की ऊर्जा तथा प्रकाश को केंद्र में रखकर बनाए गए हैं। मान्यता है कि कटारमल मंदिर की संरचना इस प्रकार बनाई गई थी कि सुबह सूर्य की पहली किरण मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचती थी और भगवान सूर्य की प्रतिमा को प्रकाशित करती थी। यही विशेषता इसे आस्था के साथ-साथ प्राचीन विज्ञान और वास्तु ज्ञान का भी उदाहरण बनाती है।

 

54 छोटे मंदिरों से घिरा है मुख्य देवालय

 

कटारमल सूर्य मंदिर केवल एक मंदिर नहीं बल्कि पूरा मंदिर समूह है। इसके परिसर में विभिन्न आकार और स्वरूप के करीब 54 छोटे मंदिर मौजूद हैं। इन मंदिरों के मध्य मुख्य बड़ादित्य मंदिर स्थित है। परिसर में मौजूद नक्काशी, पत्थरों की बनावट और स्थापत्य शैली उस दौर की धार्मिक और सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाती है।

 

सूर्यकुंड से होता था भगवान का अभिषेक

 

मंदिर के दक्षिणी भाग में एक प्राचीन जल स्रोत मौजूद है, जिसे सूर्यकुंड कहा जाता है। मान्यता है कि पुराने समय में इसी सूर्यकुंड के जल से भगवान आदित्य देव का नियमित अभिषेक किया जाता था। बताया जाता है कि यहां कभी शेषशैय्या पर विराजमान भगवान नारायण की प्रतिमा भी स्थापित थी, जिसे बाद में सुरक्षा की दृष्टि से मंदिर के गर्भगृह में संरक्षित किया गया।

 

उत्तराखण्ड में सूर्य उपासना की प्राचीन परंपरा

 

कटारमल सूर्य मंदिर यह बताता है कि उत्तराखण्ड में सूर्य उपासना की परंपरा बेहद प्राचीन रही है। टिहरी जिले के पलेठी क्षेत्र में स्थित भानु मंदिर को भी प्रदेश के प्राचीन सूर्य मंदिरों में गिना जाता है। माना जाता है कि यह मंदिर सातवीं शताब्दी का है। इसी तरह अल्मोड़ा क्षेत्र में गुणादित्य मंदिर अपनी दुर्लभ आदित्य प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध रहा है। उत्तरकाशी, चम्पावत और पिथौरागढ़ के कई क्षेत्रों में भी प्राचीन सूर्य मंदिरों और सूर्य उपासना से जुड़े प्रमाण मिलते हैं।

 

सिर्फ मंदिर नहीं, उत्तराखण्ड के गौरव की पहचान

 

कटारमल सूर्य मंदिर आज भी इतिहास प्रेमियों, श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। यह धरोहर बताती है कि हिमालय की गोद में बसे उत्तराखण्ड में सदियों पहले कला, विज्ञान, धर्म और वास्तुकला का कितना अद्भुत संगम मौजूद था। पत्थरों में दर्ज यह इतिहास आज भी आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति और विरासत से जोड़ने का कार्य कर रहा है।

 

 

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