- रक्षाबंधन पर खुलते हैं वंशी नारायण मंदिर के कपाट, देवभूमि की अनोखी परंपरा आज भी है जीवित
NBM Facts | क्या आप जानते हैं?
शुभम कुमार
उत्तराखण्ड को देवभूमि यूं ही नहीं कहा जाता। हिमालय की शांत वादियों में बसे यहां के मंदिर केवल आस्था के केंद्र नहीं हैं, बल्कि अपने भीतर सदियों पुरानी परंपराओं, लोक विश्वास और अनसुनी कहानियों को भी संजोए हुए हैं। ऐसी ही एक अद्भुत विरासत चमोली जिले की उर्गम घाटी में स्थित भगवान विष्णु को समर्पित वंशी नारायण मंदिर है। इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां आम मंदिरों की तरह पूरे वर्ष पूजा-अर्चना नहीं होती। लोक मान्यता के अनुसार इसके कपाट साल में केवल एक दिन रक्षाबंधन के अवसर पर भक्तों के लिए खोले जाते हैं। सूर्योदय के साथ मंदिर के द्वार खुलते हैं और दिनभर श्रद्धालु भगवान विष्णु के दर्शन करते हैं। सूर्यास्त के बाद कपाट फिर अगले वर्ष तक के लिए बंद कर दिए जाते हैं।
रक्षाबंधन से जुड़ी है विशेष परंपरा
रक्षाबंधन के दिन यहां का वातावरण बेहद खास होता है। आसपास के गांवों से महिलाएं और युवतियां पारंपरिक श्रद्धा के साथ मंदिर पहुंचती हैं और भगवान विष्णु को रक्षासूत्र अर्पित करती हैं। मान्यता है कि भगवान को राखी अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल की कामना की जाती है। उर्गम घाटी के साथ आसपास के गांवों के लोग इस परंपरा को पीढ़ियों से निभाते आ रहे हैं।
भगवान विष्णु और राजा बलि की कथा से जुड़ा विश्वास
इस मंदिर से जुड़ी एक प्रचलित पौराणिक कथा भगवान विष्णु के वामन अवतार और राजा बलि से संबंधित मानी जाती है। कथा के अनुसार भगवान विष्णु राजा बलि के वचन के कारण उनके साथ रहने लगे थे। भगवान विष्णु की अनुपस्थिति से चिंतित माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षासूत्र बांधा और भगवान विष्णु को वापस लाने का वरदान मांगा। इसी धार्मिक प्रसंग से जोड़कर रक्षाबंधन के दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा की परंपरा मानी जाती है।
हिमालय की गोद में छिपी अनमोल धरोहर
वंशी नारायण मंदिर चमोली जिले की खूबसूरत उर्गम घाटी में स्थित है। हिमालय के प्राकृतिक वातावरण के बीच मौजूद यह स्थल आस्था के साथ-साथ उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है। यहां तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को पहाड़ी रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है, लेकिन यही कठिन यात्रा इस अनुभव को और विशेष बना देती है। देवभूमि उत्तराखण्ड की ऐसी परंपराएं हमें याद दिलाती हैं कि भारत की संस्कृति केवल इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि आज भी पहाड़ों के गांवों और लोक आस्थाओं में जीवित है।
