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शुभम कुमार । नवभारत मीडिया

देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में रहस्य और कौतूहल छिपा है। कल ‘एनबीएम फैक्ट्स’ में पाताल भुवनेश्वर की गुफा के रहस्यों को उजागर करने के बाद, आज हम आपको लेकर चल रहे हैं पिथौरागढ़ जिले में थल के पास स्थित दो ऐतिहासिक गांवों—अल्मियां और बलतिर के बीच। इन दोनों गांवों के बीच ‘भोलियाछीड़’ नाम की एक विशाल चट्टान है, जिस पर प्रकृति और कला का एक ऐसा अनूठा संगम मौजूद है जिसे दुनिया ‘हथिया देवाल’ के नाम से जानती है।

लगभग आठवीं सदी के कत्यूर साम्राज्य की स्थापत्य शैली को समेटे यह मंदिर आज भी दुनिया भर के इतिहासकारों के लिए एक बड़ा रहस्य है। इसके निर्माण को लेकर इतिहास के पन्नों और लोक-कथाओं में दो ऐसी कहानियां प्रचलित हैं, जो रोंगटे खड़े कर देती हैं।

पहली कहानी: समाज के तानों पर ‘हौसले’ का प्रहार

स्थानीय लोक-मान्यताओं के अनुसार, भोलियाछीड़ चट्टान के पास स्थित गांव में एक बेहद गुणी शिल्पकार रहता था। एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना में उसका एक हाथ पूरी तरह बेकार हो गया। इसके बाद गांव के कुछ लोगों ने उसे अक्षम समझकर ताने मारना और उलाहना देना शुरू कर दिया। स्वाभिमानी शिल्पी को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने अपने हुनर को साबित करने के लिए किसी से कुछ नहीं कहा। वह एक रात अपनी छेनी और हथौड़ा लेकर निकला और अकेले ही, सिर्फ एक हाथ के दम पर, रातों-रात इस विशाल चट्टान को काटकर एक भव्य मंदिर खड़ा कर दिया। इसके बाद वह शिल्पी हमेशा के लिए गांव छोड़कर चला गया, मानो उसने समाज को बता दिया हो कि हुनर हाथों में नहीं, हौसलों में होता है।

दूसरी कहानी: क्रूर राजा के अहंकार को शिल्पी का जवाब

इस मंदिर से जुड़ी दूसरी कहानी कत्यूर साम्राज्य के एक क्रूर राजा से जुड़ी है। कहा जाता है कि इस शिल्पी ने राजा के लिए एक बेहद खूबसूरत महल बनाया था। राजा के मन में अहंकार और डर बैठ गया कि कहीं यह शिल्पी किसी और के लिए इससे सुंदर महल न बना दे, इसलिए उसने शिल्पी का एक हाथ कटवा दिया। राजा को सबक सिखाने और अपनी कला का लोहा मनवाने के लिए उस शिल्पी ने महज एक रात में इस बेजोड़ मंदिर का निर्माण कर राजा के अहंकार को मिट्टी में मिला दिया।

रात का अंधकार और ‘दिशाभ्रम’ का वो शाप!

भोलियाछीड़ की चट्टान पर तराशे गए इस भव्य मंदिर में जैसे ही आप प्रवेश करेंगे, तो आपको दोनों कहानियों में सच्चाई की झलक साफ दिखेगी। लेकिन इस भव्य कलाकृति के साथ एक त्रासद भूल भी जुड़ी है। रात्रि के घने अंधकार में काम करने के कारण शिल्पी से एक भारी ‘दिशाभ्रम’ (दिशा की चूक) हो गया। शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग का मुख उत्तर दिशा की ओर होना अनिवार्य है, लेकिन जल्दबाजी और अंधेरे के कारण यहाँ शिवलिंग दक्षिणमुखी बन गया।

सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार दक्षिणमुखी शिवलिंग की सामान्य पूजा दोषपूर्ण मानी जाती है। यही कारण है कि इतना अद्भुत मंदिर होने के बावजूद यहाँ कभी भी पूजा-अर्चना नहीं की जाती। हालांकि, स्थानीय लोग आज भी लोकपर्वों पर मंदिर के पास बने प्राचीन नौले (पारंपरिक जल स्रोत) में जरूर जुटते हैं, लेकिन मंदिर के भीतर दीया जलाने से परहेज करते हैं।

प्रशासन की बेरुखी

धार्मिक मान्यताओं और दोषों से इतर, यदि वास्तुकला और इतिहास के चश्मे से देखा जाए तो यह मंदिर दुनिया के बेहतरीन अजूबों में से एक है। बिना किसी सीमेंट, गारे या जोड़ के, सिर्फ एक अखंड चट्टान को ऊपर से नीचे काटकर बनाया गया यह स्थापत्य कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि इस वैश्विक धरोहर को लेकर शासन और प्रशासन की बेरुखी जगजाहिर है। पर्यटन मानचित्र पर इसे वो स्थान नहीं मिल सका जिसका यह हकदार था। उचित रखरखाव और प्रचार-प्रसार के अभाव में यह अनूठा इतिहास गुमनामी के आंसू बहा रहा है।

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