- 15 साल की उम्र में घर छोड़ गए थे बुद्धि बल्लभ उपाध्याय, साधु बनकर लौटे तो पूरे गांव की आंखें नम हो गईं
पिथौरागढ़। मां की ममता और बेटे के रिश्ते की एक ऐसी कहानी उत्तराखंड के पिथौरागढ़ से सामने आई है, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया। जिस बेटे का इंतजार करते-करते साल नहीं बल्कि लगभग आधी सदी गुजर गई, वही बेटा 48 साल बाद साधु के रूप में जब घर की दहलीज पर पहुंचा तो एक मां का वर्षों पुराना इंतजार खत्म हो गया।
बेरीनाग विकासखंड के ग्राम पंचायत चौड़ा पौस्ताला के डोलीगाड़ गांव निवासी तारा दत्त उपाध्याय और नंदी देवी के बेटे बुद्धि बल्लभ उपाध्याय वर्ष 1978 में महज 15 साल की उम्र में अचानक घर से लापता हो गए थे।
परिवार ने रिश्तेदारों से लेकर दूर-दराज के इलाकों तक उनकी तलाश की, लेकिन बुद्धि बल्लभ का कोई पता नहीं चला। समय बीतता गया। पिता तारा दत्त उपाध्याय भी बेटे से मिलने की आस लिए इस दुनिया से चले गए, लेकिन मां नंदी देवी के दिल में बेटे के लौटने की उम्मीद कभी खत्म नहीं हुई।
वक्त ने करवट ली और 4 जून 2026 को भगवा वस्त्र पहने एक साधु अपने पैतृक घर पहुंचा। वर्षों की दूरी और बदले हुए चेहरे के कारण पहली नजर में कोई पहचान नहीं पाया, लेकिन जब साधु ने भिक्षा के लिए आवाज लगाई तो मां नंदी देवी ठिठक गईं।
मां ने चेहरे से नहीं… अपने बेटे की आवाज से उसे पहचान लिया। सामने अपने खोए हुए बेटे बुद्धि बल्लभ को देखकर मां ने उसे गले से लगा लिया और दोनों की आंखों से आंसू छलक पड़े।
यह भावुक नजारा देखकर पूरा गांव भावुक हो गया। बड़ी संख्या में ग्रामीण इस अनोखे मिलन को देखने पहुंचे।
बताया जा रहा है कि घर छोड़ने के बाद बुद्धि बल्लभ ने कई जगह संघर्ष किया। उन्होंने कलिनर का काम किया और धीरे-धीरे उनका झुकाव आध्यात्म की ओर हो गया। बाद में उन्होंने राजस्थान के बीकानेर में साधु जीवन अपना लिया।
बुद्धि बल्लभ ने अपने पिता, भाइयों और परिवार का हाल जाना। पिता के निधन की खबर सुनकर वह कुछ पल के लिए खामोश हो गए। उन्होंने अपने भाइयों के साथ बचपन की पुरानी यादें भी ताजा कीं।
