- तविषी उपाध्याय
हर साल 2 अक्टूबर को गांधी हमारे सार्वजनिक जीवन में फिर लौटते हैं। अखबारों में उनकी तस्वीरें छपती हैं, स्कूलों में सभाएं होती हैं और सोशल मीडिया पर उनके कथन साझा किए जाते हैं। सत्य, अहिंसा और स्वतंत्रता जैसे शब्द एक बार फिर हमारे आसपास सुनाई देने लगते हैं। एक दिन के लिए गांधी हर जगह होते हैं। फिर 3 अक्टूबर आता है, पोस्टर उतर जाते हैं और हम अपनी दिनचर्या में लौट जाते हैं। गांधी को याद करने में कोई बुराई नहीं है। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या हमने उन्हें याद करना बहुत आसान बना दिया है?
हमारी स्मृति में बसे गांधी की छवि बहुत सहज है- गोल चश्मा, हाथ में लाठी, चरखा और कुछ जाने-पहचाने कथन। लेकिन वास्तविक गांधी इससे कहीं अधिक जटिल थे। उन्होंने अपने समय की राजनीति और समाज पर सवाल उठाए, अपनी मान्यताओं को लगातार परखा और जरूरत पड़ने पर लोगों को असहज करने से भी नहीं हिचके। उनका सत्याग्रह केवल अहिंसक विरोध का तरीका नहीं था। उसमें अनुशासन, संयम और सबसे बढ़कर, अपने विश्वास के लिए खड़े रहते हुए खुद से सवाल करने का साहस शामिल था।
गांधी का यही पक्ष आज की उस दुनिया में खास तौर पर प्रासंगिक लगता है, जिसमें Gen Z बड़ी हुई है।
अपनी बात कहने के हमारे पास आज जितने माध्यम हैं, उतने शायद पहले कभी नहीं थे। एक पोस्ट कुछ ही मिनटों में बहस बन सकती है। कोई तर्क हजारों किलोमीटर दूर तक पहुंच सकता है, इससे पहले कि उसका संदर्भ लोगों तक पहुंचे। हम स्क्रीन के पीछे बैठकर किसी मुद्दे का समर्थन कर सकते हैं, किसी व्यक्ति की निंदा कर सकते हैं या किसी आंदोलन का हिस्सा बन सकते हैं।
लेकिन इस तेज़ी के बीच एक चीज़ पीछे छूटती जा रही है- सुनना।
हम अक्सर किसी व्यक्ति को समझने से पहले ही उसके बारे में अपनी राय बना लेते हैं। यह जाने बिना कि वह क्या कह रहा है, हम यह तय कर लेते हैं कि वह कौन है।
यहीं गांधी एक दिलचस्प विचार के रूप में सामने आते हैं—किसी पूर्ण और त्रुटिहीन व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे विचार के रूप में जो हमें असहज सवालों के सामने खड़ा करता है।
गांधी का विश्वास था कि किसी विचार का विरोध उस व्यक्ति से नफरत किए बिना भी किया जा सकता है, जो उस विचार को मानता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर बात से सहमत हुआ जाए या गलत के सामने चुप रहा जाए। इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि हम किसी से कह सकें- “मैं आपसे पूरी तरह असहमत हूं”- और फिर भी अपनी असहमति को नफरत में बदलने से बचें।
कहना आसान है, करना नहीं।
गांधी को आलोचना से परे रखना भी उचित नहीं है। उनके विचारों, राजनीतिक निर्णयों और दूसरे नेताओं के साथ उनके मतभेदों पर दशकों से बहस होती रही है। उनके चिंतन के कुछ पहलू आलोचना के योग्य हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें आज के संदर्भ में फिर से समझने की जरूरत है। उन्हें एक निर्दोष संत के रूप में प्रस्तुत करना न गांधी के साथ न्याय करता है, न इतिहास के साथ।
जिस व्यक्ति ने अपना जीवन समाज से सवाल करने में बिताया, उसे इस तरह याद करना विडंबनापूर्ण होगा कि उसके बारे में सवाल पूछना ही गलत समझा जाए।
गांधी का एक और विचार आज विशेष रूप से प्रासंगिक लगता है- साध्य जितना महत्वपूर्ण है, साधन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहां परिणाम सबसे अधिक मायने रखते हैं। हम चीज़ें जल्दी चाहते हैं और अक्सर किसी कार्रवाई को इस आधार पर देखते हैं कि उससे हमारा पक्ष सफल हुआ या नहीं। राजनीति में, सोशल मीडिया पर और यहां तक कि रोज़मर्रा की बहसों में भी, अपने पक्ष से की गई किसी कार्रवाई को सही ठहराना और वही काम दूसरे पक्ष से होने पर उसकी आलोचना करना आसान है।
गांधी का विचार इससे कहीं कठिन था- जिस रास्ते से हम किसी लक्ष्य तक पहुंचते हैं, वह अंततः उस समाज का हिस्सा बन जाता है जिसे हम बनाना चाहते हैं।
तुरंत प्रतिक्रिया देने वाली पीढ़ी के लिए यह एक धीमा विचार है।
और शायद इसी वजह से यह विचार करने लायक भी है।
गांधी को Gen Z की विचारधारा बनने की जरूरत नहीं है। शायद उन्हें ऐसा बनना भी नहीं चाहिए। हम एक अलग भारत में रहते हैं और ऐसी समस्याओं का सामना करते हैं जिनकी गांधी कल्पना भी नहीं कर सकते थे। लेकिन उनके सवाल आज भी हमारे सामने खड़े हैं।
क्या हम असहमति को लोगों को दुश्मन बनाए बिना व्यक्त कर सकते हैं?
क्या हम यह स्वीकार कर सकते हैं कि हम गलत भी हो सकते हैं?
क्या हम किसी चीज़ के लिए लड़ते हुए खुद को उस लड़ाई में खोने से बचा सकते हैं?
और जब हम स्वतंत्रता की मांग करते हैं, तो क्या हम उसके साथ आने वाली जिम्मेदारी को स्वीकार करने के लिए भी तैयार हैं?
ये पुराने सवाल नहीं हैं।
2 अक्टूबर को हम एक बार फिर गांधी को याद करेंगे। स्वतंत्रता संग्राम, उनकी तस्वीरें और उनके परिचित शब्द हमारे सामने होंगे। लेकिन शायद अधिक ईमानदार श्रद्धांजलि यह होगी कि हम उस गांधी को भी याद करें, जो हमेशा सहज नहीं थे- वह गांधी, जो हमें केवल अपने विरोधियों को देखने के बजाय खुद को भी परखने के लिए कहते थे।
इस गांधी जयंती पर शायद असली सवाल यह नहीं है कि क्या हमें गांधी अब भी याद हैं।
सवाल यह है कि जिस तरह हम बोलते हैं, असहमत होते हैं और विरोध करते हैं- क्या उसी प्रक्रिया में हम गांधी को भूल तो नहीं गए हैं?
