ऑनलाइन फार्मेसी के खिलाफ आज मेडिकल स्टोर बंद !
रूद्रपुर/नई दिल्ली। देशभर में आज मेडिकल स्टोरों की 24 घंटे की हड़ताल को लेकर दवा कारोबारियों के बीच दो राय खुलकर सामने आने लगी है। एक ओर अखिल भारतीय दवा विक्रेता संगठन (एआईओसीडी) के बैनर तले लाखों मेडिकल व्यवसायी ऑनलाइन दवा बिक्री के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ दवा विक्रेता इस हड़ताल से दूरी बनाकर मरीजों की सुविधा को प्राथमिकता देने की बात कह रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर मेडिकल व्यवसायी हड़ताल पर क्यों हैं और इस विरोध के पीछे असली वजह क्या है?
दरअसल, देशभर के मेडिकल व्यवसायियों का आरोप है कि ऑनलाइन दवा बिक्री का कारोबार तेजी से पारंपरिक मेडिकल स्टोरों के अस्तित्व पर खतरा बनता जा रहा है। ई-फार्मेसी कंपनियां भारी छूट और होम डिलीवरी के जरिए बाजार पर कब्जा कर रही हैं। छोटे शहरों और कस्बों में वर्षों से मेडिकल स्टोर चला रहे कारोबारी इसे अपने रोजगार पर सीधा हमला मान रहे हैं। उनका कहना है कि दवा कोई सामान्य उपभोक्ता वस्तु नहीं है, बल्कि इससे मरीज की जिंदगी जुड़ी होती है। ऐसे में बिना पर्याप्त निगरानी और नियमों के ऑनलाइन दवा बिक्री खतरनाक साबित हो सकती है।
एआईओसीडी का कहना है कि वर्तमान में ऑनलाइन दवा बिक्री को लेकर स्पष्ट और मजबूत कानून नहीं हैं। संगठन विशेष रूप से जीएसआर-817 अधिसूचना का विरोध कर रहा है, जिसे वह ऑनलाइन दवा कारोबार को बढ़ावा देने वाला कदम मानता है। दवा विक्रेताओं का आरोप है कि कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बिना वैध प्रिस्क्रिप्शन के दवाएं बेच रहे हैं, जिससे नशीली और संवेदनशील दवाओं के दुरुपयोग का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा नकली दवाओं और गलत दवा पहुंचने जैसी आशंकाएं भी जताई जा रही हैं।
मेडिकल व्यवसायियों का एक बड़ा वर्ग यह भी मानता है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भारी डिस्काउंट देकर बाजार की प्रतिस्पर्धा को असंतुलित कर रहे हैं। उनका कहना है कि स्थानीय मेडिकल स्टोर सीमित मार्जिन पर काम करते हैं, जबकि बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियां निवेश के दम पर लंबे समय तक घाटा सहकर बाजार पर कब्जा करने की रणनीति अपनाती हैं। इससे छोटे दुकानदार धीरे-धीरे कारोबार से बाहर हो सकते हैं।
हालांकि इस आंदोलन का दूसरा पक्ष भी सामने आ रहा है। कई मेडिकल संचालकों और स्वतंत्र फार्मासिस्टों ने इस हड़ताल से खुद को अलग रखा है। उनका कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े व्यवसाय में पूरी तरह बंदी उचित नहीं मानी जा सकती। कुछ दवा कारोबारियों का मानना है कि ऑनलाइन दवा बिक्री को पूरी तरह बंद करने के बजाय सख्त नियम और पारदर्शी व्यवस्था लागू की जानी चाहिए। उनका तर्क है कि डिजिटल दौर में तकनीक को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, बल्कि इसे नियंत्रित और सुरक्षित बनाना ज्यादा जरूरी है।
कुछ मेडिकल संचालकों ने यह भी कहा कि मरीजों को आपातकालीन परिस्थितियों में दवा उपलब्ध कराना उनकी नैतिक जिम्मेदारी है। ऐसे में हड़ताल के कारण आम लोगों, खासकर बुजुर्गों और गंभीर मरीजों को परेशानी उठानी पड़ सकती है। यही वजह है कि कई शहरों में चुनिंदा मेडिकल स्टोर खुले रखने की तैयारी भी की गई है।
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल ऑनलाइन बनाम ऑफलाइन कारोबार का नहीं, बल्कि दवा वितरण प्रणाली में तेजी से हो रहे बदलाव का संकेत है। आने वाले समय में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती मरीजों की सुरक्षा, दवा की गुणवत्ता और पारंपरिक मेडिकल कारोबार के बीच संतुलन बनाए रखने की होगी।
फिलहाल देशभर में मेडिकल व्यवसायियों की यह हड़ताल स्वास्थ्य क्षेत्र में चल रही बड़ी बहस का केंद्र बन गई है। अब सबकी नजर केंद्र सरकार पर टिकी है कि वह ऑनलाइन दवा बिक्री को लेकर क्या रुख अपनाती है और मेडिकल व्यवसायियों की मांगों पर कितना गंभीर कदम उठाती है।
