पारंपरिक राजनीति के अंत और ‘जेन जी’ (Gen Z) के प्रभाव से नेपाल में एक नये युग की शुरुआत; ‘बफर स्टेट’ से ‘वाइब्रेंट ब्रिज’ बनने की ओर बढ़ते कदम।
डॉ. सौरभ का विश्लेषण: नेपाल की राजनीति में इस समय एक बड़ा ‘राजनैतिक भूकंप’ आया है। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) की ऐतिहासिक जीत और बलेंद्र ‘बालेन’ शाह का नेतृत्व केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि नेपाल के राजनैतिक परिदृश्य में एक गहरे संरचनात्मक बदलाव का संकेत है। पेश है इस बदलाव के मुख्य पहलुओं पर एक विस्तृत रिपोर्ट:
1. पारंपरिक शक्तियों की विदाई और RSP का उदय
नेपाल के मतदाताओं ने केपी शर्मा ओली और ‘प्रचंड’ जैसे दिग्गज नेताओं की पारंपरिक पार्टियों को सिरे से नकार दिया है।
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युवा शक्ति का प्रभाव: 2022 के बाद से जुड़े 9 लाख से अधिक नए मतदाताओं (Gen Z) ने व्यवस्था परिवर्तन के पक्ष में मतदान किया।
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मुद्दे: भ्रष्टाचार, आर्थिक संकट, बढ़ती बेरोजगारी और शासन के प्रति गहरा असंतोष इस जीत की मुख्य वजह रहे।
2. महत्वाकांक्षी घरेलू सुधार: सिस्टम बदलने की तैयारी
बालेन शाह के नेतृत्व में RSP ने जो घोषणापत्र पेश किया है, वह नेपाल के प्रशासनिक ढांचे को पूरी तरह बदलने का वादा करता है:
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सीधे निर्वाचित प्रधानमंत्री: पार्टी मतदाताओं द्वारा सीधे पीएम चुनने और पूरी तरह से आनुपातिक संसदीय प्रणाली की वकालत कर रही है।
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विशेषज्ञ सरकार: मंत्रालयों की संख्या सीमित कर 18 की जाएगी, जिनमें से 14 मंत्रालयों का संचालन ‘विशेषज्ञ मंत्रियों’ द्वारा किया जाएगा।
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संपत्ति की जांच: 1990 के बाद से सभी सार्वजनिक पदधारकों की संपत्ति की जांच और अवैध संपत्ति का राष्ट्रीयकरण।
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आर्थिक लक्ष्य: अगले दशक में 30,000 मेगावाट बिजली उत्पादन, 12 लाख नौकरियां और जीडीपी को 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य।
3. ‘नेपाल फर्स्ट’ और विदेश नीति का नया रुख
बालेन शाह एक ऐसी राष्ट्रवादी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो समानता के आधार पर संबंधों को देखती है।
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विशेष संबंध बनाम समानता: शाह भारत के साथ ‘विशेष संबंधों’ को ‘नेपाल पहले’ (Nepal First) के दृष्टिकोण से देखते हैं। कालापानी-लिपुलेख और 1950 की संधि जैसे मुद्दों पर उनका रुख यथार्थवादी और राष्ट्रवादी है।
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सक्रिय सेतु (Vibrant Bridge): नेपाल अब खुद को भारत और चीन के बीच केवल एक ‘बफर स्टेट’ नहीं, बल्कि एक ‘सक्रिय आर्थिक सेतु’ के रूप में स्थापित करना चाहता है।
4. भारत के लिए रणनीतिक चुनौती
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल की इस लोकतांत्रिक उपलब्धि पर बधाई दी है, लेकिन भारत के लिए कूटनीतिक राह चुनौतीपूर्ण है:
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चीन का प्रभाव: भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि शाह की ‘नेपाल फर्स्ट’ नीति कहीं ‘चीन फर्स्ट’ में न बदल जाए।
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नेबरहुड फर्स्ट: भारत को अपनी सहायता को शाह की तकनीकी प्राथमिकताओं (डिजिटल कनेक्टिविटी, जलविद्युत) के साथ जोड़ना होगा।
