तकनीकी क्रांति या सभ्यता का संकट: क्या जनरेटिव एआई ही आधुनिक युग का ‘कलि पुरुष’ है?

मानव सभ्यता का इतिहास मूलतः उसके द्वारा निर्मित उपकरणों और औजारों के विकास की गाथा है। पाषाण युग के नुकीले पत्थरों से लेकर इक्कीसवीं सदी की चमकती डिजिटल स्क्रीनों तक, हर तकनीकी छलांग ने मानवीय क्षमताओं का विस्तार किया है। लगभग तीन लाख वर्ष पूर्व अस्तित्व में आए मानव ने शिकार, कृषि और औद्योगिकीकरण के माध्यम से स्वयं को बौद्धिक रूप से स्थापित किया। किंतु आज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के रूप में एक ऐसी तकनीक हमारे सामने है, जो केवल एक उपकरण मात्र न रहकर ‘स्वतंत्र मेधा’ होने का आभास दे रही है।

औद्योगिक क्रांति से डिजिटल युग तक का सफर अठारहवीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति ने शारीरिक श्रम की निर्भरता को मशीनों की ओर मोड़ा। उस समय भी विस्थापन के भय से प्रतिरोध हुए, किंतु अंततः मशीनीकरण आधुनिकता का पर्याय बन गया। यही स्थिति बीसवीं सदी के मध्य में डिजिटल क्रांति के दौरान भी देखी गई। शुरुआती कंप्यूटर पूरी तरह से मानवीय निर्देशों और निर्णयों पर आश्रित थे, लेकिन आज यह समीकरण बदलता प्रतीत हो रहा है।

जनरेटिव AI: एक मूक परिपक्वता वर्ष 1956 के ‘डार्टमाउथ सम्मेलन’ से शुरू हुआ एआई का सफर कई उतार-चढ़ाव (एआई विंटर) से गुजरते हुए आज ‘जनरेटिव एआई’ के रूप में हमारे सामने है। नवंबर 2022 में ‘ChatGPT’ के सार्वजनिक आगमन ने इतिहास में सबसे तीव्र तकनीकी विस्तार दर्ज किया। आज यह तकनीक केवल डेटा का विश्लेषण नहीं कर रही, बल्कि मानवीय रचनात्मकता की नकल करते हुए टेक्स्ट, ऑडियो और वीडियो भी सृजित कर रही है। समर्थक इसे उत्पादकता का भविष्य मान रहे हैं, तो वहीं आलोचक इसे गलत सूचनाओं के प्रसार और नौकरियों के संकट के रूप में देख रहे हैं।

नैतिकता का संकट और स्वायत्तता का भ्रम हालिया कुछ घटनाओं ने विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया है। कतिपय प्लेटफार्मों पर एआई एजेंटों द्वारा मानव नैतिकता की आलोचना करना और आपस में ऐसी भाषा में संवाद करना जो मनुष्य की समझ से परे हो, एक गहरे सांस्कृतिक डर को जन्म देता है। यह पहली बार है जब मशीनें केवल आदेशों का पालन नहीं कर रहीं, बल्कि ‘स्वायत्तता’ का प्रदर्शन कर रही हैं। यह धुंधली होती सीमाएं बुद्धिमत्ता और नैतिक जिम्मेदारी की पुरानी धारणाओं को गंभीर चुनौती दे रही हैं।

सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य: क्या यह ‘कलि’ का उदय है? भारतीय संदर्भ में इन चिंताओं को अक्सर पौराणिक आख्यानों से जोड़ा जा रहा है। दार्शनिक और विचारक इस तकनीकी विस्तार की तुलना ‘कलियुग’ के उस दौर से कर रहे हैं जहाँ नैतिक मूल्यों का ह्रास होता है। कुछ विद्वान इसे आधुनिक युग के ‘कलि पुरुष’ के रूप में देख रहे हैं, तो कुछ इसे कल्कि अवतार की उस भविष्यवाणी के रूप में देख रहे हैं जहाँ मानवता को पुनः अपनी शुचिता और मूल्यों को परिभाषित करना होगा।

निष्कर्ष: मानवीय मूल्यों की अनिवार्यता इतिहास गवाह है कि हर तकनीकी क्रांति ने मानवता को खुद को फिर से परिभाषित करने के लिए मजबूर किया है। एआई का यह दौर भी इसका अपवाद नहीं है। चुनौती यह है कि हम इस नई परिभाषा को पारदर्शिता, सहानुभूति और जिम्मेदारी के धरातल पर विकसित करें। यदि हमने नैतिक स्पष्टता और प्रभावी नियामक ढांचा तैयार नहीं किया, तो बुद्धिमत्ता का यह टकराव भविष्य के लिए एक बड़ा संकट बन सकता है।

                  -आदित्य नेगी, शोधार्थी, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय

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