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ऋषिकेश/देहरादून

देवभूमि उत्तराखंड के राजाजी टाइगर रिजर्व से मानवता और वन्यजीव संरक्षण को शर्मसार करने वाली एक हृदयविदारक घटना सामने आई है। जहाँ एक ओर सरकार वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए करोड़ों का बजट आवंटित करती है, वहीं दूसरी ओर एक गंभीर रूप से घायल हाथी गंगा नदी के तट पर दिनभर असहनीय पीड़ा से कराहता रहा। विडंबना यह रही कि जिम्मेदार तंत्र उसे उपचार देने के बजाय मूकदर्शक बना तमाशा देखता रहा।

दर्द से कराहता रहा गजराज, सीमा में उलझा रहा विभाग सोमवार तड़के ग्रामीणों ने गौहरीमाफी क्षेत्र स्थित बिरला मंदिर के समीप एक हाथी को नदी किनारे अत्यंत दयनीय अवस्था में देखा। हाथी के एक पैर में गहरा घाव था, जिसके कारण वह अपना भार संभालने में भी असमर्थ था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, घायल हाथी बार-बार चिंघाड़कर अपनी पीड़ा व्यक्त कर रहा था, जो किसी मदद की गुहार जैसी प्रतीत हो रही थी।

सबसे विचलित करने वाला दृश्य तब उत्पन्न हुआ जब वन विभाग की दो टीमों के बीच ‘सीमा विवाद’ देखने को मिला। आरोप है कि घायल हाथी की सुध लेने और उसे तत्काल चिकित्सा उपलब्ध कराने के बजाय, दोनों ओर तैनात वनकर्मी उसे अपनी-अपनी सीमा से खदेड़ने में व्यस्त रहे। इस विभागीय खींचतान के बीच वह बेजुबान जानवर पूरे दिन भूख और चोट के दर्द से तड़पता रहा।

ग्रामीणों में रोष, उच्चाधिकारियों को नहीं दी गई सूचना स्थानीय निवासियों ने हाथी की स्थिति देखकर गहरा रोष व्यक्त किया है। ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग को समय पर सूचित किए जाने के बावजूद शाम तक रेस्क्यू की कोई ठोस पहल नहीं की गई। आश्चर्यजनक तथ्य यह भी सामने आया है कि क्षेत्र के फील्ड स्टाफ ने इतनी गंभीर स्थिति की जानकारी उच्च अधिकारियों तक पहुँचाना भी आवश्यक नहीं समझा।

हालांकि, आधिकारिक पक्ष में वन विभाग का कहना है कि हाथी की मॉनिटरिंग की जा रही है ताकि वह आबादी क्षेत्र में प्रवेश न करे। विभाग ने उपचार के प्रयास करने की बात कही है, परंतु धरातल पर हाथी की तड़प और विभागीय सुस्ती संरक्षण के दावों पर बड़े सवाल खड़े करती है।

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