आकांक्षा नई दिल्ली: वैश्विक कूटनीति और व्यापारिक गलियारों में भारत ने एक बड़ी रणनीतिक बढ़त हासिल की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई उच्च स्तरीय मंत्रणा के सुखद परिणाम सामने आए हैं। अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर आयात शुल्क (टैरिफ) को 25% से घटाकर 18% करने का निर्णय लिया है। वाशिंगटन का यह कदम न केवल भारतीय निर्यातकों के लिए संजीवनी साबित होगा, बल्कि एशियाई बाजार में चीन और पाकिस्तान जैसे प्रतिद्वंद्वियों के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
एशियाई बाजार में मजबूत हुई भारत की धाक
टैरिफ में की गई इस कटौती ने दक्षिण-पूर्व एशिया के निर्यात समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। अब तक कपड़ा और विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र में वियतनाम, बांग्लादेश और इंडोनेशिया से मिल रही कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच, भारतीय उत्पाद अब अमेरिकी बाजार में सबसे प्रतिस्पर्धी और किफायती दर पर उपलब्ध होंगे। विशेष रूप से चीन पर लगे भारी टैरिफ के मुकाबले भारत की स्थिति अब अत्यंत सुदृढ़ हो गई है।
तुलनात्मक टैरिफ ढांचा (अमेरिकी बाजार में):
| देश | नया टैरिफ दर |
| भारत | 18% |
| इंडोनेशिया | 19% |
| पाकिस्तान | 19% |
| बांग्लादेश | 20% |
| वियतनाम | 20% |
| चीन | 34% |
रणनीतिक शर्तें और विदेश नीति के नए आयाम
इस व्यापारिक सुगमता के साथ ही कुछ महत्वपूर्ण रणनीतिक शर्तें भी रेखांकित की गई हैं, जो भविष्य में भारत की ऊर्जा नीति को प्रभावित कर सकती हैं। व्हाइट हाउस के आधिकारिक वक्तव्य के अनुसार, इस रियायत के बदले भारत को रूसी तेल की निर्भरता कम कर अमेरिका से ऊर्जा संसाधनों की खरीद बढ़ानी होगी। यदि भारत रूसी तेल की खरीद को सीमित करता है, तो दंडात्मक शुल्क हटने के बाद प्रभावी टैरिफ और भी कम हो सकते हैं। साथ ही, अमेरिकी राष्ट्रपति ने भविष्य में भारत की ओर से भी व्यापारिक बाधाएं कम करने की अपेक्षा जताई है।
शेयर बाजार में रिकॉर्ड बढ़त: निवेशकों की चांदी
समझौते की घोषणा होते ही भारतीय शेयर बाजार में अभूतपूर्व उछाल देखा गया। मंगलवार को सेंसेक्स और निफ्टी ने लंबी छलांग लगाई, जिससे निवेशकों की संपत्ति में लगभग 13 लाख करोड़ रुपये का इजाफा हुआ। कपड़ा, आईटी, इंजीनियरिंग और रत्न-आभूषण क्षेत्रों के शेयरों में जबरदस्त लिवाली दर्ज की गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत को ‘ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब’ बनाने के संकल्प को सिद्ध करने की दिशा में मील का पत्थर है। हालांकि, रूस के साथ ऊर्जा संबंधों को संतुलित करना और घरेलू बाजार में महंगाई पर नियंत्रण बनाए रखना केंद्र सरकार के लिए आगामी समय में एक बड़ी कूटनीतिक परीक्षा होगी।
