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प्रयागराज। मासूम बच्चों के साथ यौन शोषण के सबसे घिनौने मामलों में से एक में, विशेष अदालत ने आरोपी रामभवन और उसकी सहयोगी दुर्गावती को फांसी की सजा सुनाई है। इस ऐतिहासिक फैसले की बुनियाद उन 69 मासूम बच्चों के बेबाक बयान बने, जिन्होंने वर्षों तक चुप रहने के बाद अदालत में अपनी आपबीती सुनाई। 3 से 17 साल की उम्र के इन बच्चों ने बताया कि कैसे ‘अंकल-आंटी’ ने उनके बचपन को तहस-नहस कर दिया।

सीबीआई की जांच में सामने आया कि मुख्य आरोपी रामभवन अपने घर पर बच्चों को अश्लील वीडियो और खिलौने दिखाकर जाल में फंसाता था। बच्चों ने अदालत को बताया कि जब वे दर्द से चीखते थे, तो उन्हें वीडियो गेम में उलझाकर शांत करा दिया जाता था। इस दौरान आरोपी की पत्नी दुर्गावती मूकदर्शक बनी रहती थी या बच्चों को डराकर चुप कराती थी। आरोपियों ने दूध वाले, नौकरानी और आसपास के गरीब परिवारों के बच्चों को ‘कंप्यूटर सिखाने’ या ‘पैसे देने’ के बहाने अपना शिकार बनाया। एक मासूम ने तो यहाँ तक बताया कि कुकृत्य के बाद उसे इतना तेज बुखार आया कि वह घर में इशारों से भी अपनी पीड़ा नहीं समझा सका।

इस मामले में सीबीआई ने बच्चों के अलावा 74 अन्य गवाहों को पेश किया, जिनमें 22 शिक्षक, डॉक्टर और सरकारी अधिकारी शामिल थे। शिक्षकों ने बच्चों के नाबालिग होने की पुष्टि की, जबकि डॉक्टरों की मेडिकल रिपोर्ट ने उन पर हुए अमानवीय अत्याचारों पर मुहर लगाई। डिजिटल साक्ष्यों और वीडियो में आरोपियों की मौजूदगी ने बचाव पक्ष के हर तर्क को ध्वस्त कर दिया। अदालत ने माना कि एक लोकसेवक के पद पर रहते हुए रामभवन ने जो अपराध किया, उसके लिए नरमी बरतना समाज के साथ अन्याय होगा।

माननीय न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए पूरे फैसले में पीड़ितों की पहचान को पूरी तरह गुप्त रखा है। फैसले में जिलाधिकारी को आदेश दिया गया है कि वे इसकी प्रति भारत सरकार और मुख्य सचिव को भेजें, ताकि भविष्य में ऐसे पीड़ित बच्चों के पुनर्वास और उपचार के लिए एक उच्चाधिकार समिति का गठन किया जा सके। अदालत का यह कड़ा रुख न केवल अपराधियों के लिए सबक है, बल्कि व्यवस्था को जगाने की एक कोशिश भी है।

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