Screenshot_8

काशी विद्वत परिषद और सनातन रक्षक दल ने जताया कड़ा विरोध, आयोजकों ने बताया प्राचीन संस्कृति

वाराणसी। मोक्ष की नगरी काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर खेली जाने वाली ‘मसाने की होली’ को लेकर विवाद गहरा गया है। काशी विद्वत परिषद और सनातन रक्षक दल जैसे प्रमुख संगठनों ने इस आयोजन पर आपत्ति जताते हुए इसे शास्त्रों के विरुद्ध बताया है। विरोध कर रहे पक्षों का तर्क है कि श्मशान की अपनी एक मर्यादा होती है और इसे उत्सव का केंद्र बनाना अनुचित है।

काशी विद्वत परिषद के सदस्य पंडित विनय पांडेय ने स्पष्ट किया कि श्मशान में होली खेलना कहीं से भी शास्त्र सम्मत नहीं है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों से इसे प्राचीन परंपरा के नाम पर प्रचारित किया जा रहा है, जबकि वास्तव में यहाँ युवक-युवतियों द्वारा मर्यादाहीन आचरण किया जा रहा है। वहीं, सनातन रक्षक दल के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा का दावा है कि यह प्रथा वर्ष 2014 में केवल औघड़ बाबाओं को ठंडाई पिलाने के नाम पर शुरू हुई थी, जिसे अब गलत तरीके से 400 साल पुराना बताया जा रहा है।

धार्मिक मान्यताओं का हवाला देते हुए विरोधियों का कहना है कि पुराणों के अनुसार, बिना ठोस कारण श्मशान जाने वाले व्यक्ति को एक माह का सूतक लगता है। आरोप है कि आयोजन में नशे और हुड़दंग का बोलबाला बढ़ गया है, जिससे काशी की छवि धूमिल हो रही है। यहाँ तक कि विख्यात शास्त्रीय गायक दिवंगत पंडित छन्नूलाल मिश्रा के लोकप्रिय गीत ‘मसाने की होली’ को भी स्पष्ट किया गया कि वह भगवान शिव की स्तुति में था, न कि इस वर्तमान प्रथा के समर्थन में।

दूसरी ओर, आयोजन समिति के गुलशन कपूर ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका तर्क है कि काशी स्वयं महाश्मशान है और स्वयं महादेव यहाँ चिता भस्म से होली खेलते हैं, जिसका उल्लेख वेद पुराण और दुर्गा सप्तशती में मिलता है। उन्होंने विरोध करने वालों को ‘बाहरी’ बताते हुए आरोप लगाया कि मुगल काल में यह प्रथा दब गई थी जिसे अब पुनर्जीवित किया गया है। कपूर ने विरोधियों पर ‘चंदाजीवी’ होने का आरोप लगाते हुए कहा कि स्वार्थ सिद्ध न होने के कारण इस पवित्र परंपरा को बदनाम करने की साजिश रची जा रही है।

error: Content is protected !!