इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के एक संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए, प्रतिबंधित स्थान पर नमाज अदा करने के आरोपी दो छात्रों के विरुद्ध चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि बिना किसी आपराधिक इतिहास वाले छात्रों पर मुकदमा चलाना उनके भविष्य के लिए उचित नहीं होगा।
क्या था पूरा मामला? यह प्रकरण उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले से संबंधित है, जहाँ वर्ष 2019 में दो छात्रों पर प्रशासनिक आदेशों के उल्लंघन का आरोप लगा था। उन पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 143 (गैरकानूनी सभा) और धारा 188 (लोक सेवक द्वारा घोषित आदेश की अवज्ञा) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। मई 2019 में निचली अदालत ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए छात्रों को समन जारी किया था।
न्यायालय में बचाव पक्ष की दलीलें याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कोर्ट में तर्क दिया कि दोनों युवक केवल छात्र हैं और उनका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। वकील ने जोर देकर कहा कि वे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं और ऐसे “मामूली अपराध” के लिए उन पर मुकदमा चलना उनके करियर और भविष्य को अंधकार में डाल सकता है।
लोकतंत्र और मर्यादा पर कोर्ट की टिप्पणी अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद एक संतुलित टिप्पणी की। न्यायमूर्ति ने कहा, “एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में प्रत्येक नागरिक को अपने विश्वासों और रीति-रिवाजों का पालन करने का पूर्ण अधिकार है।” हालांकि, कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि एक विविधतापूर्ण समाज में कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है।
अंतिम निर्णय और चेतावनी 17 फरवरी को जारी अपने आदेश में उच्च न्यायालय ने दोनों आवेदकों के विरुद्ध चल रही कार्यवाही को निरस्त कर दिया। राहत प्रदान करने के साथ ही कोर्ट ने छात्रों को सख्त चेतावनी भी दी। अदालत ने कहा कि भविष्य में किसी भी धार्मिक गतिविधि के दौरान उन्हें स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी किए गए निर्देशों और प्रतिबंधों का कड़ाई से पालन करना होगा।
