Screenshot_47

दवाओं पर महंगाई की मार: फार्मा कंपनियों का बढ़ा ‘सिरदर्द’; 0.6% की मामूली बढ़ोतरी से गहराया संकट

 देश में स्वास्थ्य बजट और आम आदमी की जेब पर जल्द ही बड़ा असर पड़ सकता है। कच्चे माल की बढ़ती लागत और वैश्विक सप्लाई चेन में बाधाओं के कारण फार्मा कंपनियां भारी दबाव में हैं। सरकार द्वारा जरूरी दवाओं की कीमतों में दी गई 0.6% की सीमित बढ़ोतरी को उद्योग जगत ने ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ करार दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लागत और कीमतों के बीच का यह असंतुलन बना रहा, तो आने वाले समय में न केवल दवाएं महंगी होंगी, बल्कि उनकी उपलब्धता पर भी संकट खड़ा हो सकता है।

संकट के प्रमुख कारण: क्यों बढ़ रही है लागत?

दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कई रसायनों और सॉल्वेंट्स की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। वैश्विक तनाव और लॉजिस्टिक्स की समस्याओं ने इस आग में घी डालने का काम किया है।

    • कच्चे माल की महंगाई: सिरप और ड्रॉप्स में इस्तेमाल होने वाले ग्लिसरीन और प्रोपाइलीन ग्लाइकोल जैसे महत्वपूर्ण केमिकल्स के दाम तेजी से बढ़े हैं।

    • WPI आधारित सिस्टम: वर्तमान में नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आधार पर साल में एक बार कीमतें बदलने की अनुमति देती है, जो वास्तविक उत्पादन लागत की तुलना में काफी कम है।

    • सीमित मार्जिन: कंपनियां ऊंचे दाम पर कच्चा माल खरीद रही हैं, लेकिन सरकार द्वारा नियंत्रित कीमतों (NLEM) के कारण वे इसे ग्राहकों पर नहीं डाल पा रही हैं।

प्रभावित दवाओं की श्रेणी (NLEM सूची)

नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (NLEM) के तहत आने वाली लगभग 1000 दवाओं पर इसका सीधा असर दिख रहा है:

श्रेणी उदाहरण
सामान्य दर्द निवारक पैरासिटामोल (Paracetamol)
संक्रमण रोधी विभिन्न एंटीबायोटिक्स (Antibiotics)
जीवनशैली बीमारियां डायबिटीज और ब्लड प्रेशर की दवाएं
गंभीर रोग कैंसर और हृदय रोगों से संबंधित जीवन रक्षक दवाएं
error: Content is protected !!