पटना नगर निगम में हंगामे के आसार: 50 करोड़ के राजस्व घाटे के बीच नई नीति पर तीखी बहस

पटना: बिहार सरकार द्वारा ‘नगरपालिका क्षेत्र विज्ञापन नियमावली 2025’ में किए गए हालिया संशोधनों ने राज्य के नगर निकायों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। पटना नगर निगम समेत राज्य के सभी निकायों को भेजे गए इस संशोधित ड्राफ्ट में सबसे विवादित पहलू अवैध विज्ञापनों पर लगने वाले भारी-भरकम जुर्माने को समाप्त करना है। आज शनिवार को पटना नगर निगम बोर्ड की होने वाली महत्वपूर्ण बैठक में इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी झड़प होने की प्रबल संभावना है।

जुर्माने का ‘चाबुक’ हटा, विपक्ष ने उठाए सवाल संशोधित नियमावली का सबसे चौंकाने वाला बदलाव आउटडोर विज्ञापन नियमों के उल्लंघन पर लगने वाले 100 से 200 प्रतिशत तक के जुर्माने को पूरी तरह हटाना है। अब तक अवैध होर्डिंग लगाने वालों पर कड़े आर्थिक दंड का प्रावधान था, जिसे अब समाप्त कर दिया गया है। नई नीति के अनुसार, नगरपालिका अधिनियम 2027 के तहत केवल ‘सुसंगत कार्रवाई’ की जाएगी, परंतु इस कार्रवाई की रूपरेखा और प्रभावशीलता को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है। विपक्षी पार्षदों का तर्क है कि दंड का प्रावधान हटने से शहर में अवैध होर्डिंग्स की बाढ़ आ जाएगी और प्रशासन का नियंत्रण और कमजोर होगा।

राजस्व की हानि और सुरक्षा पर मंडराता संकट विगत एक दशक से स्पष्ट विज्ञापन पॉलिसी न होने के कारण अकेले पटना नगर निगम को प्रतिवर्ष लगभग 50 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। यही स्थिति राज्य के अन्य 19 नगर निगमों की भी है। वर्तमान में शहर में बिना किसी सुरक्षा मानक के ऊंची इमारतों पर लोहे के भारी ढांचे खड़े किए जा रहे हैं, जो राहगीरों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं। नई नीति में शुल्क के ‘बेस रेट’ और अलग-अलग जोन के लिए निर्धारित राशि को लेकर भी पार्षदों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

बोर्ड की बैठक के अन्य महत्वपूर्ण एजेंडे आज की बैठक केवल विज्ञापन नीति तक सीमित नहीं रहेगी। एजेंडे में डोर-टू-डोर कचरा उठाव के लिए नए संसाधनों की खरीद, प्रत्येक वार्ड के विकास हेतु एक-एक करोड़ रुपये की योजनाएं और संपत्ति कर (Property Tax) पर ब्याज व जुर्माने में छूट जैसे लोक-लुभावन मुद्दे भी शामिल हैं। हालांकि, विज्ञापन नियमावली पर होने वाला विवाद अन्य विषयों पर भारी पड़ सकता है।

नगर निगम के अधिकारियों का मानना है कि इस नीति के लागू होने से वर्षों से लंबित विज्ञापन प्रक्रिया को एक दिशा मिलेगी, जबकि पार्षद इसे निगम के अधिकारों में कटौती और अवैध कारोबारियों को छूट देने के रूप में देख रहे हैं।

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