- आकांक्षा राजपूत
नोएडा। कहते हैं कि आधुनिक शहर इंसान की सहूलियत के लिए बसाए जाते हैं, लेकिन नोएडा के सेक्टर-150 में जो हुआ, उसने साबित कर दिया कि ऊँची इमारतें और चमकती लाइटें सिर्फ एक भ्रम हैं। यह उस समय ‘सिस्टम’ की मौत हो गई, जब 27 साल का एक होनहार इंजीनियर, युवराज मेहता, अपनी डूबती कार की छत पर खड़ा होकर पौने दो घंटे तक ज़िंदगी की भीख मांगता रहा और किनारे पर खड़े 80 ‘वर्दीधारी’ तमाशबीन बने उसकी मौत का इंतज़ार करते रहे।
लापरवाही का गहरा गड्ढा और कोहरे की चादर
गुरुग्राम से घर लौटते युवराज को क्या पता था कि जिस सड़क पर वह टैक्स चुकाकर चल रहा है, वहीं मौत उसका रास्ता रोके खड़ी है। घने कोहरे के बीच एक तीखा मोड़ और बिना किसी साइन बोर्ड या बैरिकेडिंग के खुला पड़ा वह गहरा गड्ढा-यह हादसा नहीं, बल्कि सीधे तौर पर प्रशासनिक हत्या है। कार पानी में गिरी, लेकिन युवराज की हिम्मत नहीं टूटी। उसने फोन किया, लोकेशन भेजी और कार की छत पर बैठकर टॉर्च से इशारा करता रहा। वह चीखता रहा, ‘मुझे बचा लो!’ लेकिन वह चीख नोएडा के बहरे सिस्टम के कानों तक नहीं पहुँच सकी।
तैयारी का खोखला दावारू 80 जवान बनाम एक जान
घटनास्थल पर पुलिस, फायर ब्रिगेड और एसडीआरएफ के 80 से ज््यादा जवान मौजूद थे। विडंबना देखिए कि जिस देश के पास मंगल तक पहुँचने की तकनीक है, उसके पास एक नौजवान को गड्ढे से निकालने के लिए दो घंटे तक एक ‘नाव’ या ‘राफ्ट’ नहीं थी। कड़ाके की ठंड का बहाना बनाकर रेस्क्यू टीम किनारे पर खड़ी रही, जबकि युवराज मौत से जंग लड़ रहा था। एसडीआरएफ को अपनी राफ्ट फुलाने और तैयारी करने में ही 120 मिनट लग गए। यह दो घंटे नहीं थे, यह उस सिस्टम की सुस्ती थी जिसे हम अपनी सुरक्षा का ज़िम्मा सौंपते हैं।
सिस्टम के गाल पर तमाचा है यह मौत
सुबह 6 बजे जब युवराज का निर्जीव शरीर बाहर निकला, तो वह सिर्फ़ एक लाश नहीं थी, बल्कि हमारे खोखले विकास पर एक बड़ा सवालिया निशान था। जब तक मदद पहुँची, युवराज की साँसे और उसके मोबाइल की बैटरी, दोनों जवाब दे चुकी थीं। क्या हम इतने लाचार हो चुके हैं कि संसाधनों के अंबार के बीच भी एक युवक को पानी से बाहर नहीं निकाल सकते?
यह मौत नोएडा प्राधिकरण और आपातकालीन सेवाओं के गाल पर एक करारा तमाचा है। युवराज तो चला गया, लेकिन पीछे छोड़ गया है वे सुलगते सवाल, जिनका जवाब देने की हिम्मत शायद ही किसी अधिकारी में हो। आज एक घर का चिराग बुझ गया है, और इसका ज़िम्मेदार कोहरा नहीं, वह ‘कोढ़’ है जो हमारे सिस्टम की कार्यशैली में समा चुका है।
