चिपको आंदोलन की 52वीं वर्षगांठ: जब ‘रेणी’ की महिलाओं ने पेड़ों को अपना कवच बनाया; गौरा देवी के उस साहस की अनकही गाथा
चमोली/देहरादून। आज से ठीक 52 वर्ष पहले, उत्तराखंड के चमोली जिले की नीती घाटी के एक छोटे से गांव ‘रेणी’ से पर्यावरण संरक्षण की वह गूंज उठी थी, जिसने पूरी दुनिया को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बना दिया। 26 मार्च को शुरू हुआ ‘चिपको आंदोलन’ केवल पेड़ों को बचाने का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह उस अटूट विश्वास का प्रतीक था कि पहाड़ की आजीविका और अस्तित्व उसके जंगलों में ही बसता है। आज इस ऐतिहासिक आंदोलन की 52वीं वर्षगांठ पर रेणी गांव की महिलाएं एक बार फिर गौरा देवी के पदचिह्नों पर चलने का संकल्प दोहरा रही हैं।
इतिहास: जब कुल्हाड़ियों के सामने ‘ढाल’ बन गईं महिलाएं
सत्तर के दशक में जब देश में वन संरक्षण के लिए कोई सख्त कानून नहीं थे, तब जंगलों का अंधाधुंध कटान चरम पर था।
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26 मार्च का वह दिन: साइमन एंड कंपनी के मजदूर 2500 पेड़ों को काटने के लिए रेणी गांव पहुँचे। गांव के पुरुष मुआवजे के सिलसिले में तहसील गए हुए थे।
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गौरा देवी का नेतृत्व: खतरे को भांपते हुए गौरा देवी ने गांव की महिलाओं को एकत्रित किया। जब मजदूर नहीं माने, तो महिलाएं पेड़ों से चिपक गईं और दहाड़ते हुए कहा— “पेड़ों को काटने से पहले हमें काटो।”
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अभूतपूर्व जीत: महिलाओं के इस अहिंसक लेकिन प्रचंड विरोध के आगे ठेकेदारों और मजदूरों को पीछे हटना पड़ा। यह विश्व का अपनी तरह का पहला ऐसा आंदोलन बना जहाँ आम जनता ने सीधे तौर पर सत्ता और ठेकेदारों को चुनौती दी थी।
